अली अशरफ फातमी से अहमर ज़ेया की प्रतिक्रिया

खुद को मुस्लिम का अकेला मसीहा कहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व सांसद जनाब अली अशरफ फातमी साहब की तवज्जोह चाहूंगा।

 

आपने अपने राजनीति जीवन की शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव से की और वहीं से आपकी बुलंदी का सितारा उरूज पे पहुँचा, छात्र जीवन में राजनीतिक सूझ-बूझ ने आपको बिहार बुलाया और दरभंगा से लालू जी की राजनीतिक जीवन में हिस्सेदार बनाया। लालू जी ने भी आपकी राजनीतिक सूझ-बूझ को समझा परखा और आपके निजी क्षेत्र मिथिलांचल से आपको एक बड़े मुस्लिम नेता के रूप में खड़ा किया।

आपने भी इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी अंजाम देकर 1991 में कद्दावर और खांटी कांग्रेस नेता नागेंद्र झा को हरा कर मिथिलांचल से लेकर पटना तक खलबली मचा दी, आपका ये जीत का कारवां 15 साल तक चला फिर 5 साल आपको आराम करने का मौका और फिर 5 साल बाद आप फिर आये केंद्रीय मंत्री का पद लेकर।

 

इस 20 साल के कैरियर में आपने खुद को मजबूत किया लेकिन किसी बड़े मुस्लिम चेहरा को उभरने नही दिया, आपकी नज़र में आज तक ऐसा कोई राजद का चेहरा नही दिखा जिसे आपने अपने राजनीतिक जीवन में बनाया हो या उसको अपने बाद दूसरे नंबर पे रखा हो। आख़िर क्यूँ?

 

दरभंगा शहर से सन 2000 में राजद की टिकट से जीते सुल्तान अंसारी साहब के राजनैतिक जीवन की हत्या क्या आपने नही की?

वही सुलतान साहब जो रोड से उठ कर पार्षद चुना गया और राजद के कोटे से चुनाव लड़कर फर्स्ट एटेम्पट में विधायक भी बना और अपने 5 साल के कैरियर में सुलतान साहब ने दरभंगा शहर के लिए अनेकों काम किये। अलपसंख्यक से लेकर बहुसंख्यक बहुल क्षेत्र में प्राइमरी स्कूल इन्ही की देन है। दरभंगा टाउन में रोड की स्तिथि भी इन्ही के काल में सुधरी। गरीबों के लिए हमेशा खड़े रहे, हर पिछड़े इलाके में चापाकल गरवाया, गरीबों के बरसात में ढह जाने वाले छप्पड़ों को इसने फिर से उठाया, बाढ़ की समस्या से निजात के लिए गिदरगंज का बांध का मुरम्मत करवाया, गिनाने बैठूं तो रात हो जाएगी।

 

सुलतान साहब की इसी लोकप्रियता से आपके पैर थरथराने लगी, शरीर मे कम्पन होने लगा। सन 2005 में आपने इसका काट निकाला और ऐसा काट की अंसारी का टिकट काट कर अंसारी को ही दिया। जिस मुमताज़ अंसारी को आपने टिकट दिया उसको अपने मोहल्ले वाले या दरभंगा कोर्ट वाले बा वकील की हैसियत से जानते थे, राजनीति में उनका चेहरा ज़्यादा फेमस नही था। और पूरे दरभंगा वाले जानते हैं कि आपने मुमताज़ अंसारी को टिकट क्यूँ दिया, उसपे मैं ज़्यादा नही लिख पाऊंगा।

 

मुमताज़ अंसारी के टिकट का नतीजा उनको फ़रवरी 2005 के विधानसभा में हार के रूप में मिली जो तय था क्यूंकि वो मुमताज़ अंसारी सुल्तान अंसारी था, जिसने अपने काम से जनता के दिल मे जगह बनाई थी।

 

जब 2005 के विधानसभा के बाद राष्ट्रपति शासन लगा तो छह महीने बाद के इलेक्शन में यहां की टिकट अंदर ही अंदर गठबंधन से मदन मोहन झा जी को मिली और वो भी हार बीस हज़ार के अंतर से हारे।

 

सुल्तान अंसारी के साथ जो विश्वासघात आपने किया उसकी खबर पूरे अल्पसंख्यक से छिपी नही रही, खास कर अंसारी समाज से।

शहर का एक अंसारी बहुल क्षेत्र आपसे खुन्नस खाने लगा और जिस इलाके में सिर्फ राजद का झंडा दिखता था वहां कांग्रेस ने अपना पंजा जमाना शुरू किया, लोगों ने आपका बायकॉट करके मजबुरन कांग्रेस को थामा।

 

क्यूंकि अंसारी समाज दरभंगा शहर में बहुतायत की वजह से किसी भी चुनाव का किंगमेकर माना जाता है तो आपने अपनी गलती सुधारने के लिए और अंसरियों में अपनी खोई इज़्ज़त वापस पाने के लिए फिर से सुलतान साहब को मैदान में उतारा। लेकिन क्या फायदा जब लोग सुल्तान साहब के सन 2000 के कामों को भूल चुके थे और संजय सरावगी जी अपनी पकड़ बना चुके थे। नतीजा वही हुआ जो आप चाह रहे थे, सुल्तान साहब हारे और आपको खुशी मिली, एक मोहरे से दो शिकार आपने कर लिया।

 

जिस अंसरियों की बदौलत आप 15 साल तक जीतते आए उसी में से उभरे एक नेता की “राजनैतिक हत्या” जी हाँ “राजनैतिक हत्या” आपने बड़े सरल तरीके से की।

 

आपको इस बात का अंदाज़ा लग गया था कि सुल्तान साहब की नजदीकी सिद्दीकी साहब से ज़्यादा बढ़ रही है और वो सिद्दीकी खेमे के चहेते नेता में शुमार होने लगे थे, इसलिए आपने वर्चस्व की आन में एक उभरते हुए नेता को ठंडा कर दिया।

 

आज जब 15 साल से आप हारते हुए आ रहे हैं और किसी कारणवश राजद ने आपका “काट” लिया तो आप खुद को मुस्लिम का इकलौता हितैसी नेता बोलने से नही चूक रहे हैं,और सिद्दीकी साहब पे डायरेक्ट काउंटर कर रहे हैं।

 

अब आपका दिन लदा, मधुबनी से आपने दावेदारी की थी मधुबनी जाइये और वहां किसी मुस्लिम नेता का कैरियर बर्बाद कीजिये।

 

दरभंगा का अंसारी अब बरका का गोस जादे नही खाता है तो बुद्धि अब मोटा नही है, आपके कारनामे को अच्छे से समझ चुका है ये समाज।

आपके बोलने पे ये समाज बिखरेगा नही ये बात या

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