सूफी संत भीखा शाह सैलानी का 369वां उर्स शनिवार से होने जा रहा है ।

दरभंगा । मिश्रटोला, पश्चिमी दिग्घी तालाब स्थित प्रसिद्ध सूफी संत हज़रत मखदूम भीखा शाह सैलानी दरगाह पर र.अ. का 369वां सालाना उर्स (वार्षिकोत्सव) 25 अगस्त से 29 अगस्त के बीच आयोजित होगा । उर्स (वार्षिकोत्सव) में सम्पूर्ण मिथिलांचल के साथ अन्य जिलों व पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, जिनमें बूढ़े-बच्चे, महिला-पुरुष सभी होते हैं। मिथिलांचल के सबसे पुराने दरगाह और आध्यात्मिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध दरगाह हज़रत मखदूम भीखा शाह सैलानी को मानने वाले सभी धर्म-समुदाय के लोग हैं और यह उर्स साम्प्रदायिक सद्भाव तथा एकता को भी प्रदर्शित करता है, दरगाह पर आने वाले श्रद्धालुओं में सभी धर्म के लोग होते हैं।
हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र मिश्रटोला, दिग्घी तालाब के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित दरगाह पर स्थानीय हिन्दू समुदाय का भी सराहनीय सहयोग हर वर्ष उर्स के आयोजन को सफल बनाने के साथ साथ आपसी भाईचारे को भी पेश करता है।

हर वर्ष की दरगाह शरीफ का द्वार सुबह 5:30 बजे खुलकर रात्रि 10 बजे बन्द होगा, इस बीच श्रद्धाल चादर चढ़ाएंगे

इस अवसविभिन्न ग्रुप्स और मुहल्लों से आकर चादर चढ़ाते हैं, स्थानीय हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय द्वारा अंतिम दिन भव्य जुलूस के साथ चादर चढ़ाया जाता है जो शहर के विभिन्न मुहल्लों से गुजरता है।
उर्स के आखरी दिन दरगाह परिसर में ही क़व्वाली का भी आयोजन किया जाता है जो तकरीबन दो घंटे की अवधि का और सूफियाना होता है, अंतिम दिन दरगाह पर खादिम ए दरगाह की ओर से मज़ार शरीफ पर चादरपोशी किया जाता है, उसी दिन सामूहिक प्रार्थना भी की जाती है
अंतिम दिन समापन के कारण श्रद्धालुओं के लिए दरगाह का द्वार 12 बजे रात्रि तक खुला रहता है।

दरगाह के खादिम शाह मोहम्मद शमीम के मुताबिक मदारिया सिलसिला के सूफी संत हज़रत मखदूम भीखा शाह सैलानी र. अ. 15 वीं शताब्दी में दरभंगा तशरीफ़ लाए।
उन्होंने दीन का पाठ पढ़ाया, इंसानियत सिखाई, आपसे भाईचारे का संदेश दिया।
उनके हृदय में सभी समुदाय के प्रति समान प्रेम और पीड़ा थी।
आज इसीलिए उनके मज़ार पर फूल और चादर चढ़ाने वालों में हिन्दू मुस्लिम समान रूप से दिखते हैं।

खादिम शमीम के मुताबिक उर्स के दरमियान स्थानीय हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के युवाओं, प्रशासन और शांति समिति सदस्यों का हर वर्ष पूरा सहयोग मिलता है जिससे विधि व्यवस्था के मद्देननज़र ऐसी व्यवस्था की जाती है कि उर्स में आए सभी श्रद्धालुओं के जान-माल, इज़्ज़त-आबरू की रक्षा सुनिश्चित करने के साथ साथ दरगाह परिसर व आस पास के क्षेत्र में शांति और भाईचारा कायम रहता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Don`t copy text!