रविवार को है दसवीं मुहर्रम, कोरोना संकट और सरकार के निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन किया मुस्लिम समुदाय ने

रविवार को है दसवीं मुहर्रम, कोरोना संकट और सरकार के निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन किया मुस्लिम समुदाय ने

रविवार को मुहर्रम की दस तारिख है। इस दिन को दुनिया भर के मुसलमान यौम-ए-आशूरा के रूप में मनाते हैं। मुहर्रम की नवमीं और दसवीं तारीख का इस्लाम में बड़ा महत्व है। मुस्लिम समुदाय में इस दिन को एक खास रुप मे मनाया जाता है। इस दिन लोग रोज़ा रखते हैं, दान करते हैं। भूखों को खाना और प्यासे को पानी पिलाते हैं। मालूम हो कि मुहर्रम का महीना इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना है। इस माह को गम का महीना भी कहा जाता है।

क्योंकि मुहर्रम की दसवीं तारीख को आखिरी नबी मुहम्मद साहब के नवासे(नाती) हज़रत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। देश भर में मुहर्रम के दस दिनों में इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में महफिल भी सजाई जाती है। उपरोक्त जानकारी सामाजिक कार्यकर्ता और ज़िला मुहर्रम कमिटी के प्रवक्ता शाह मोहम्मद शमीम ने दी और आगे कहा कि देश में ताजिया रखने का सिलसिला मुगलकाल से चला आ रहा है। दरभंगा में ऐसा पहली बार होगा कि मुहर्रम पर ताजिये नहीं दिखेंगे। इमामबाड़ों पर सूनापन छाया रहेगा। वैसे यहाँ ताजियादारी का पुराना इतिहास रहा है। ज़िला मुहर्रम कमिटी के रिकॉर्ड के मुताबिक 1936 से ताजियादारी के सभी कार्यक्रम निरंतर होते रहे हैं। इस साल पहली बार दसवीं मुहर्रम यौम-ए-आशूरा पर ताजिया का प्रदर्शन, मिलान और अखाड़ों का जुलूस नहीं निकलेगा। शाह मोहम्मद शमीम ने कहा कि जानकारी के मुताबिक भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय 1947 में भी दरगाहों व इमामबाड़ों से निकलने वाली ताजियों के जुलूस पर पाबंदी नहीं लगी थी लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के चलते केंद्र और राज्य

सरकार ने सभी धार्मिक सामूहिक कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी है इसलिए मुहर्रम पर न तो ताजिये रखने की और न ताजिया के साथ जुलूस निकालने की अनुमति है। शाह शमीम के मुताबिक नम आँखों और उदास मन के साथ लोगों ने नवमीं मुहर्रम का रोज़ा रखा और घरों में रहकर तिलावत व इबादत की। दसवीं मुहर्रम को भी लोग रोज़ा रखेंगे और घरों से दुआएं की जाएंगी। नवमीं और दसवीं को हज़ारों की भीड़ का गवाह बनने वाला शहर का सिनेमा चौक,

कोतवाली ओपी, किलाघाट चौक, मिलान चौक, कर्बला आदि में सन्नाटा पसरा हुआ है। मुहर्रमी धुनों, मर्शिया व अजादारों की आवाज़ कानों में इस बार सुनाई नहीं दे रही। लाठी की कड़कड़ाहट और गगनचुंबी रंग बिरंगे ताजियों और मातमी बच्चों व महिलाओं का झुण्ड कहीं नहीं दिख रहा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Don`t copy text!